अपनी मूँछें युहि ऐंठ राना छोड़।
मेरे पास बेटा है बेटी नहीं ,
इस बात पर अब एतराना छोड़ ।
जवानी में मारी कोख मे बेटियाँ
बुढापे मे मगरमच्छ के आँसू बहाना छोड़ ।
होकर तु अपने घमंड मे चूर,
अपनी मूँछें अब ऐंठराना छोड़।
लाख लगाले तु लाँछन मुझपर,
सामाजिक तत्वों से मुझे यु दबाना छोड़।
अपने पापा की बेटी हूँ बेटा नहीं,
अपने पापों का और घड़ा बढ़ाना छोड़।
होकर तु अपने घमंड मे चूर
अपनी मूँछें युहि ऐंठ राना छोड़।
मेरे पास बेटा है बेटी नहीं ,
इस बात पर अब एतराना छोड़ ।
ना हो अगर बरदाश्त तुझसे बेटियाँ
खिसियाके मुझपर गुस्सा उतारना छोड़।
चबा लो तुम दो पत्ते नीम के,
युहि अपना खून जलाना छोड़।
होकर तु अपने घमंड मे चूर
अपनी मूँछें युहि ऐंठ राना छोड़।
मेरे पास बेटा है बेटी नहीं ,
इस बात पर अब एतराना छोड़ ।
परिवारवाद...........
बेटियों को रुलाना था।
बहुओं को जलाना था।
कोख से जन्मी बच्ची को मौत के घाट सुलाना था।
ये परिवारवाद था |
बेटियों की आवाज दबाना था।
बेटो को ऊपर उठाना था।
छेडख़ानी को जमीनी विवाद बताना था।
ये परिवारवाद था |
लड़कियों पर उंगली उठाना था।
लड़को को जवान बताना था।
उनको बस गुंडई सिखाना था।
ये परिवारवाद था |
उपसब्दो का इस्तेमाल करके दिखाना था।
जमीन के खातिर लहूलुहान करवाना था।
दरिदंगी की सारी हद पार कर जाना था।
ये परिवारवाद था |




1 टिप्पणियाँ
Heart touching poems
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