मजदूर दिवस पर भी बेबस मजदूर: विकास के बीच संघर्ष की कहानी
दिहाड़ी मजदूरों की जिंदगी—मेहनत भारी, हक़ अधूरे
✍️रिपोर्ट : नौशाद मंसूरी
शाहगंज (जौनपुर)। जहां एक ओर देशभर में मजदूर दिवस पर श्रमिकों के सम्मान और अधिकारों की बातें हो रही हैं, वहीं शाहगंज की सड़कों और निर्माण स्थलों पर,बारातों में, होटलों कारखानों में बच्चे,महिला, पुरुष मजदूर आज भी रोज़ी-रोटी के संघर्ष में उलझे नजर आते हैं।
तस्वीर में दिख रहा युवा मजदूर कंधे पर लोहे की सरिया उठाए, अधूरे निर्माण कार्य के बीच अपनी जिम्मेदारियों का बोझ ढोता दिखता है। उसके चेहरे पर थकान साफ झलकती है, लेकिन मजबूरी उसे आगे बढ़ने पर मजबूर करती है।
*मजदूरों की दुर्दशा: मेहनत ज्यादा, सुविधा कम*
स्थानीय मजदूरों का कहना है कि उन्हें रोज़ 300–400 रुपये की दिहाड़ी मिलती है, जो बढ़ती महंगाई के सामने नाकाफी है।
*कोई स्थायी रोजगार नहीं*
सुरक्षा उपकरणों की कमी
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
समय पर भुगतान नहीं
कई मजदूरों ने बताया कि काम के दौरान चोट लगने पर मालिक कोई जिम्मेदारी नहीं लेते।
*प्रशासन और सरकार का पक्ष*
सरकार का दावा है कि मजदूरों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं—
श्रमिक पंजीकरण
आयुष्मान भारत योजना
मजदूर आवास योजना
स्थानीय प्रशासन का कहना है कि “मजदूरों को उनके अधिकार दिलाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, और जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं।”
*विपक्ष का आरोप*
विपक्षी नेताओं का कहना है कि ये योजनाएं कागजों तक ही सीमित हैं।उनके मुताबिक।
पंजीकरण प्रक्रिया जटिल है
मजदूरों तक सही जानकारी नहीं पहुंचती
भ्रष्टाचार के कारण लाभ नहीं मिल पाता
उन्होंने सरकार पर “मजदूरों की अनदेखी” का आरोप लगाया है।
*जमीनी हकीकतसवाल अभी बाकी*
मजदूर दिवस पर भाषण और घोषणाएं जरूर होती हैं, लेकिन शाहगंज जैसे इलाकों में हालात ज्यादा नहीं बदलते।
क्या मजदूरों को उनका हक़ मिल पाएगा?
या हर साल की तरह ये दिन भी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगा?
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